राहुल गांधी के 12 अक्टूबर के सुप्रीम कोर्ट मार्च का विरोध किया डॉ. आदीश सी. अग्रवाल ने
- श्वेता रंजन
ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष सीनियर एडवोकेट डॉ. आदीश सी. अग्रवाल ने राहुल गांधी से प्रस्तावित मार्च वापस लेने की अपील की है। उन्होंने कहा कि इंडियन एक्सप्रेस के नए खुलासे मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संसद में नया प्रस्ताव लाने का आधार बन सकते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्षी नेताओं द्वारा 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने और भारत के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपने के प्रस्ताव का संवैधानिक आधार पर कड़ा विरोध किया गया है। सुप्रीम कोर्ट बार के एक वरिष्ठ नेता ने चेतावनी दी है कि इस तरह का कदम न्यायपालिका पर अनुचित राजनीतिक दबाव डालने के साथ-साथ न्यायालय में लंबित मामलों की स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप होगा।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को लिखे पत्र में ऑल इंडिया बार एसोसिएशन के अध्यक्ष तथा सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. आदीश सी. अग्रवाल ने उनसे प्रस्तावित मार्च वापस लेने और द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित नए दस्तावेजी खुलासों के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में नया प्रस्ताव लाने पर विचार करने का आग्रह किया है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व उपाध्यक्ष भी रह चुके डॉ. अग्रवाल ने अपने पत्र में कहा, "न्यायालय में लंबित राजनीतिक रूप से विवादास्पद मामलों के संबंध में विपक्षी नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालना और भारत के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना निश्चित रूप से न्यायपालिका पर अनुचित राजनीतिक दबाव डालेगा तथा स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया में सीधा हस्तक्षेप होगा।"
उन्होंने जोर देकर कहा कि न्यायिक कार्यवाही राजनीतिक दबाव और बाहरी हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रहनी चाहिए तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा दिलाने का मुख्य न्यायाधीश को कोई प्रशासनिक अधिकार नहीं
डॉ. अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश को अपनी प्रशासनिक हैसियत में मुख्य चुनाव आयुक्त को इस्तीफा देने का निर्देश देने अथवा उन्हें पद से हटाने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।
उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के किसी निर्णय या कार्रवाई की वैधानिकता पर आपत्ति होने की स्थिति में उसका समाधान सक्षम न्यायिक पीठ के समक्ष विधिवत न्यायिक कार्यवाही के माध्यम से ही किया जाना चाहिए, न कि मुख्य न्यायाधीश को प्रशासनिक स्तर पर राजनीतिक ज्ञापन सौंपकर।
उन्होंने कहा, "भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद सर्वोच्च संवैधानिक सम्मान और जनता के विश्वास का प्रतीक है।" उन्होंने इस पद की गरिमा, स्वतंत्रता और संस्थागत निष्पक्षता बनाए रखने की आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। कहा कि इंडियन एक्सप्रेस के नए खुलासे मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नए प्रस्ताव का आधार बन सकते हैं
द इंडियन एक्सप्रेस में हाल ही में प्रकाशित खोजी रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए डॉ. अग्रवाल ने कहा कि यदि इन रिपोर्टों में सामने आए नए दस्तावेजी खुलासे सही पाए जाते हैं, तो वे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए संसद में नई कार्यवाही शुरू करने का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
उन्होंने याद दिलाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए पहले प्रस्तुत नोटिसों पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सदस्यों ने हस्ताक्षर किए थे। इन नोटिसों को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने 6 अप्रैल, 2026 को न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के अंतर्गत स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
हालांकि, डॉ. अग्रवाल ने कहा कि द इंडियन एक्सप्रेस की बाद में प्रकाशित खोजी रिपोर्टों में ऐसी महत्वपूर्ण नई सामग्री सामने आई है, जो पहले नोटिसों को अस्वीकार किए जाने के समय दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों के समक्ष उपलब्ध नहीं थी।
राहुल गांधी को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, "पहले प्रस्तुत निष्कासन प्रस्तावों के नोटिस अस्वीकार किए जाने के मद्देनजर आप और अन्य विपक्षी नेता अब मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के लिए नया प्रस्ताव प्रस्तुत करने का नोटिस दे सकते हैं। इसके समर्थन में नए सामने आए साक्ष्य और ऐसे विशिष्ट आरोप प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनसे प्रथम दृष्टया कदाचार या अक्षमता का मामला स्थापित हो सके।"
लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति अब नए प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार पा सकते हैं। डॉ. अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उसी प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है, जिनके आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है।
संवैधानिक प्रावधानों और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार, ऐसा प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 अथवा राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि पहले प्रस्तुत नोटिसों का अस्वीकार होना अपने आप में नए और ठोस साक्ष्यों पर आधारित किसी नए नोटिस पर विचार किए जाने में बाधा नहीं है।
डॉ. अग्रवाल ने कहा, "यदि रिपोर्टों में उल्लिखित साक्ष्य प्रामाणिक और महत्वपूर्ण हैं तथा मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कदाचार का मामला स्थापित करते हैं, तो लोकसभा अध्यक्ष अथवा राज्यसभा के सभापति, पहले के नोटिस अस्वीकार किए जाने के बावजूद, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3 के अंतर्गत नए प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त आधार पा सकते हैं।"
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी निष्कासन प्रस्ताव के नोटिस को प्रारंभिक स्तर पर स्वीकार करना और कदाचार या अक्षमता के आरोपों का अंतिम रूप से सिद्ध होना दो अलग-अलग चरण हैं।
प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद आरोपों की जांच निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार तीन सदस्यीय जांच समिति द्वारा की जाती है। इसके बाद ही मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के संबंध में संसद की आगे की कार्यवाही पर विचार किया जा सकता है।
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में राहुल गांधी को कांग्रेस तथा इंडिया गठबंधन के अन्य दलों के सांसदों का पर्याप्त समर्थन प्राप्त है। संबंधित सांसदों की सहमति से वह नया निष्कासन प्रस्ताव लाने के लिए आवश्यक हस्ताक्षर जुटा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि विशेष रूप से नए दस्तावेजी साक्ष्य सामने आने के बाद उपलब्ध संवैधानिक प्रक्रिया, सुप्रीम कोर्ट तक राजनीतिक मार्च निकालने के बजाय एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करती है।
राहुल गांधी को लिखे पत्र में डॉ. अग्रवाल ने कहा, "इन परिस्थितियों में, जब एक विशिष्ट संवैधानिक प्रक्रिया अभी भी उपलब्ध है और नए दस्तावेजी साक्ष्य सामने आने की खबरें प्रकाशित हुई हैं, तो इन साक्ष्यों के आधार पर संसद में नया निष्कासन प्रस्ताव लाने पर विचार करने के बजाय मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा मांगने के लिए प्रशासनिक स्तर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश से संपर्क करने का कोई औचित्य नहीं है।"
मुख्य न्यायाधीश के पद को राजनीतिक विवादों से दूर रखा जाए: डॉ. अग्रवाल ने कहा कि विपक्ष को संवैधानिक संस्थाओं के कार्यों पर सवाल उठाने और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन इसके साथ ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना भी विपक्ष की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
उन्होंने चेतावनी दी कि किसी अन्य संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे से संबंधित राजनीतिक विवाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद को शामिल करना उचित नहीं होगा।
अपने पत्र के अंत में डॉ. अग्रवाल ने राहुल गांधी से 12 अक्टूबर को प्रस्तावित सुप्रीम कोर्ट मार्च वापस लेने तथा नए सामने आए दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर संसद में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नया प्रस्ताव प्रस्तुत करने पर विचार करने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा, "ऐसा निर्णय न्यायपालिका की स्वतंत्रता में जनता के विश्वास को और मजबूत करेगा, शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत को बनाए रखेगा तथा हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा के प्रति सम्मान प्रदर्शित करेगा।"

