रेप पीड़िता की पहचान को अदालतें सार्वजनिक न होने दें: सुप्रीम कोर्ट
- श्वेता रंजन
सुप्रीम कोर्ट ने रेप मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर किए जाने पर कड़ा रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे सबसे कड़े शब्दों में निंदनीय बताया और सभी शीर्ष हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोर्ट के आदेशों में पीड़िता या उसके परिवार की पहचान किसी भी रूप में सामने न आए।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि 2018 के निपुण सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में स्पष्ट किया गया था कि मीडिया के किसी भी माध्यम प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद निचली अदालतों में इस नियम का पालन नहीं हो रहा है। इसके पीछे अदालतों की उदासीनता और इस तरह के अपराधों से जुड़े सामाजिक कलंक के प्रति जागरूकता की कमी को जिम्मेदार बताया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 1983 में भारतीय दंड संहिता में संशोधन कर धारा 228A जोड़ी गई थी, जिसका मकसद रेप पीड़िताओं की पहचान को सार्वजनिक होने से रोकना है। इससे पहले ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं था, जिससे पीड़िताओं को सामाजिक बहिष्कार और मानसिक आघात का सामना करना पड़ता था।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इस कानून का पालन सुनिश्चित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस दौरान आई, जब वह हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले की समीक्षा कर रही था जिसमें नौ साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म मामले के आरोपी को बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें को रेप के मामलों में सुनवाई के दौरान गवाहों और सबूतों में आए मामूली विरोधाभासों को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए।

