सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन अधिनियम, 1937 के अंतर्गत मुस्लिम महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण उत्तराधिकार प्रावधानों को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई की। यह याचिका लखनऊ की एडवोकेट पौलोमी पविनी शुक्ला द्वारा दायर की गई है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल उठाया, कि क्या मुस्लिम महिलाओं के लिए असमान उत्तराधिकार अधिकारों को वैधानिक मान्यता देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत प्रदत्त समानता और भेदभाव-निषेध के अधिकारों का उल्लंघन करता है।

याचिकाकर्ता एडवोकेट पौलोमी पविनी शुक्ला ने तर्क दिया है कि उत्तराधिकार के अधिकार केवल पारिवारिक विषय नहीं, बल्कि नागरिक और आर्थिक अधिकार हैं, जो सीधे तौर पर महिलाओं की गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं। याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि भारत में मुस्लिम महिलाएँ ऐसी एकमात्र श्रेणी की महिलाएँ हैं, जिनके उत्तराधिकार अधिकार अब भी व्यक्तिगत कानून को वैधानिक मान्यता मिलने के कारण असमान बने हुए हैं।

मामले की ग्राह्यता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत कानून से जुड़े मामलों में न्यायिक समीक्षा के दायरे पर विचार किया और कहा कि यह मुद्दा महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठाता है।

गौरतलब है कि एडवोकेट पौलोमी पविनी शुक्ला, कमजोर और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों पर निरंतर कानूनी पक्षसमर्थन के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने भारत में अनाथ बच्चों के लिए बेहतर नीतियों की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की थी।

हाल ही में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों के वैज्ञानिक प्रबंधन के पक्ष में भी पैरवी की है। पौलोमी पविनी शुक्ला पुस्तक “Weakest on Earth – Orphans of India” की लेखिका भी हैं, जिसमें भारत में अनाथ बच्चों की उपेक्षा, और उनसे जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए कानून और नीति में संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।